महर्षि दयानन्द सरस्वती द्वारा अनुमोदित वैदिक ब्रह्मचर्य प्रणाली एवं भारतीय संस्कृति के आधार पर ब्रह्मचारिणियों को शिक्षित बनाकर समाज व देश के लिए आदर्श नागरिक, विदुषी तथा तन, मन, धन की दृष्टि से स्वावलम्बी, पूर्ण स्वस्थ, चरित्रवान्, गुणवान्, सादा जीवन उच्च विचार की कन्यायें तैयार करना। जातपात का भेदभाव मिटाकर आदर्श समाज का निर्माण करना।