हमारे संस्थापक: स्वामी ओमानन्द सरस्वती
जन्म: स्वामी ओमानन्द सरस्वती (पूर्व नाम आचार्य भगवान्देव) जी का जन्म चैत्र कृष्णा 8 संवत् 1967 वि० (22 मार्च, 1911 ई०) में मामूरपुर, नरेला, दिल्ली-40 में चै० कनकसिंह के घर में इकलौते पुत्र के रूप में हुआ।
शिक्षा: कक्षा 12वीं तक की शिक्षा सेंट स्टीफन काॅलेज में प्राप्त करते हुए 23 मार्च, 1931 को सरदार भगतसिंह जी को फांसी आने के दिन देश प्रेम में भीष्ण प्रतिज्ञा ‘आजीवन ब्रह्मचर्यव्रत का पालन, तन, मन, धन सभी देश पर बलिदान करना’। उसके उपरान्त देश की आजादी की लड़ाई में सक्रिय रूप से भाग लिया और अनेक आन्दोलन चलाये।
जीवनचर्या: बचपन से ही आर्यसमाज के प्रति अनुराग और महर्षि दयानन्द जी द्वारा निर्दिष्ट नियमों का पालन, बचपन से ही नमक मिर्च व तामसिक खानपान का त्याग। अशिक्षितों को रात्रि पाठशाला द्वारा पढ़ाना तथा कई प्रकार के समाज सुधार के कार्य करना, नवयुवकों को व्यायाम, ब्रह्मचर्य, नैतिक शिक्षा तथा देशहित पर कुर्बान होने आदि की शिक्षा देना।
कार्य: स्वामी ओमानन्द सरस्वती जी ने देश की स्वतन्त्रता के लिए बढ़चढ़कर कार्य किया। कई बार जेलयात्रायें कीं और अनेक प्रकार की यातनाएं सहीं। स्वतन्त्रता मिलने के बाद फिर सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ संघर्ष छेड़े। बालविवाह प्रथा, जाति-पांति के विरूद्ध संघर्ष किया। इसी दिशा में उन्होंने अपनी पैतृक तीन एकड़ भूमि देकर पहले आर्यसमाज नरेला (दिल्ली) की स्थापना की। तत्पश्चात् गुरूकुल झज्जर (हरयाणा) का आचार्य बनकर उसका पुनरूद्धार किया। तत्पश्चात् स्त्रीजाति के उद्धार हेतु अपनी पैतृकभूमि नरेला (दिल्ली) में दान देकर निःशुल्क कन्या गुरूकुल महाविद्यालय की स्थापना की।
इन्होंने आर्यसमाज में अनेक पदों पर रहकर उनको गौरवान्वित किया। प्रधान आर्य प्रतिनिधि सभा हरयाणा, प्रधान श्रीमती परोपकारिणी सभा अजमेर, प्रधान सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा नई दिल्ली आदि। इन्होने कई संस्थाओं की स्थापना की – आर्यवीर दल, गोशाला नरेला व झज्जर, आर्य आयुर्वेदिक रसायनशाला (गुरूकुल झज्जर), हरयाणा साहित्य
संस्थान, विश्वम्भर वैदिक पुस्तकालय व देवराज शोध-संस्थान, हरयाणा पुरातत्व संग्रहालय की स्थापना करके करोड़ों रूपयों की प्राचीन मुद्राओं आदि की खोज व उन्हें इकट्ठा करना आदि। कैंसर पर चिकित्सा अन्वेषण कर झज्जर (हरयाणा) में 100 बिस्तरों के हस्पताल की स्थापना। आर्ष कन्या गुरूकुल कुण्डली, सोनीपत तथा आर्ष गुरूकुल महाविद्यालय झज्जर (हरयाणा) के अतिरिक्त इन्हीं की प्ररेणा से इनके शिष्य तथा शिष्याएं हर प्रान्त में गुरूकुल चला रहे हैं, जैसे उड़ीसा, राजस्थान, माउंट आबू, महाराष्ट्र, हरयाणा, यू०पी० आदि-आदि।
स्वामी जी ने लगभग 80 पुस्तकों की रचना की, जिसमें विद्यार्थी जीवन, ब्रह्मचर्य जीवन, चिकित्सा सम्बन्धित इतिहास संबंधी, समाज सुधार संबंधी विषय सम्मिलित हंै।
रूस में युनेस्को द्वारा आयोजित ‘कुषाणकाल’ पर अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन एवं पुरातत्वविदों के 29वें अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन में भाग लेने का भी गौरव प्राप्त है। इसी प्रकार अफ्रीका, जापान, फार्मोसा, थाईलैण्ड, आस्ट्रेलिया, बाली, इण्डोनेशिया, फ्रंास, लन्दन, पश्चिमी जर्मनी, नार्वे, डेनमार्क, स्वीडन, हालैण्ड, स्विटजरलैण्ड, रोम आदि की यात्रा कर, पुरातत्व विभाग की सामग्री एकत्रित की।
सन् 1996 में शिकागो में सर्वधर्म सम्मेलन में भाग लिया। इन्हीं सेवाओं के उपलक्ष में भारत के महामहिम राष्ट्रपति महोदय श्री वी०वी० गिरि ने ‘राष्ट्रीय पंडित’ की उपाधि से विभूषित किया। हरयाणा सरकार भाषा विभाग द्वारा राजकीय सम्मान से सम्मानित, दिल्ली राज्य की ओर से उपराज्यपाल ने किया। इसी प्रकार फरवरी 1999 में सत्यार्थप्रकाश महोत्सव के शुभ अवसर पर माननीय श्री अशोक गहलोत मुख्यमंत्री राजस्थान के सान्निध्य में रूपये इकत्तीस लाख (3100000/-) की थैली भेंट करके स्वागत किया गया।
पिता जी
चैधरी कनकसिंह जी
सुपुत्र चैधरी निहाल सिंह जी
जन्मस्थान: नरेला, दिल्ली
पिताजी से विरासत में सज्जनता प्राप्त करनेवाले आपको अपार सम्पति के अधिकारी होने पर भी धन का मद कभी भी छू नहीं सका। नरेला में अपने सहयोगियों के साथ आपके द्वारा स्थापित आर्यसमाज
मन्दिर आपके मन्त्रित्व में ऋषि दयानन्द के सन्देशों के प्रचार-प्रसार का केन्द्र स्थल रहा और वर्तमान में भी है। समाजसेवा, लोकापकार, धर्मप्रचार और शुभकार्यों में आपका सम्पूर्ण जीवन समर्पित रहा एवं भावी पीढ़ी के लिए अनुकरणीय आदर्श प्रस्तुत करता रहा।
माता जी
श्रीमती नान्हीदेवी जी
जन्मस्थान-गोच्छी, रोहतक
आप सेवा, पतिव्रत एवं धार्मिकता में आदर्श भारतीय संस्कृति की साकार रूप थीं। बालक ‘भानु’ के अन्दर तेज, तप तथा वैराग्य के जलसेचन से उदार मानवतावाद के बीजों से अंकुरित एवं पल्लवित कर ‘स्वामी ओमानन्द सरस्वती’ के विशाल वटवृक्ष की छाया में विश्व को आश्रय प्राप्त करवाने के मूल में आपका आदर्श प्यार था। आपका समस्त जीवन शान्ति और प्रेम के विचारों का प्रचारक रहा।
स्वामी ओमानन्द सरस्वती
पता:- आर्ष कन्या गुरूकुल कुण्डली, प्याऊ मनियारी रोड़, सोनीपत-131028
सम्पर्क सूत्र:- मो. 9999299300, 9999655363

